
| भारतवर्ष का सत्यसनातन सभ्यतामूलक चिंतन प्रवाह सदैव उस वैदिक परम्परा का प्रतिनिधि रहा है. जिसमें वसुधा को कुटुंब मानते हुए सर्व के मंगल की कामना की गई है. परन्तु जिस राष्ट्र ने विश्व को सभ्यता के सच्चिदानंदमय उत्कर्ष एवं "सर्व देव समस्कारं केशवं प्रति गच्छति" का बोध कराया, वही उन बर्बर एवं असहिष्णु विचारधाराओं के आघात का निरंतर शिकार बनाया गया. जो "केवल हम सही, शेष सब नरक पथगामी" के विचार का दम्भपूर्ण अनुसरण करते थे. यदि पहले वे सरहद पार से आने वाले आक्रमणकारी थे तो अब एक विद्रूप एवं मिथ्या सेकुलरवाद के आवरण में मतिभ्रमित हिंदू, जिहादी एवं साम्राज्यवादी मतान्तरण के पोषक आक्रामक ईसाई इन आघातों को नियोजित कर रहे हैं. हमें विश्वास है कि इस वैचारिक संघर्ष में धर्म, न्याय और राष्ट्रीयता की ही विजय होगी. परन्तु उस विजय को सुनिश्चित करने के लिए हमें जिस वैचारिक पाथेय की आवश्यकता है वह प्रायः हमें हमारे मनोनुकूल समय पर उपलब्ध ही हो, यह आवश्यक नहीं होता.
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यह अन्तः क्षेत्र (website) उस कमी को पूरा करने का एक प्रयास है. इसमें आप परमपूज्य श्री गुरूजी, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय की वाणी और विचारों के प्रकाश में किसी भी प्रकार का प्रश्न पूछ सकते हैं. प्रश्न भेजने से पूर्व कृपया इस अन्तः क्षेत्र पर स्वयं को पंजीकृत (registration) करायें. आप प्रश्न हिन्दी अथवा अंग्रेजी में पूछ सकते हैं. आप का प्रश्न हम किसी भी एक उपलब्ध माननीय चिन्तक एवं अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर उनका उत्तर आपको ई-मेल (e-mail) से भेज देंगे और जिन अधिकारी ने आपको उत्तर दिया है उनका नाम भी हम आपको लिखेंगे. ये सभी प्रश्नोत्तर बाद में सभी पाठकों के लिए भी उपलब्ध रहेंगे.
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नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् । महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थेपतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूताइमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयंशुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये । अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिंसुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गंस्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रंपरं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठाहृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् । विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् । परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रंसमर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
।। भारत माता की जय ।। |
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| Shri Guruji was the second all-Bharat Chief of the Rashtriya Swayamsevak Sangh. He was born in 1906. The special occasion round the corner is the celebration of his birth centenary. ‘Guruji’ was not his original name. This name was used out of regard, by his students in Banaras Hindu University where he taught.
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| Dr. Syama Prasad Mookerjee was born on 6th July 1901 in a famous family. His father Sir Asutosh was widely known in Bengal. Graduated from Calcutta University he became a fellow of the Senate in 1923. He enrolled as an advocate in Calcutta High Court in 1924 after his father's death.
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| Pandit Deendayal Upadhyaya was the leader of the Bharatiya Jana Sangh from 1953 to 1968. A profound philosopher, organiser par excellence and a leader who maintained the highest standards of personal integrity, he has been the source of ideological guidance and moral inspiration for the BJP since its inception.
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